सोच.....
जैसा सोच रहे हो तुम,
उतने आज़ाद नहीं है हम
पिंजरे जैसी इस ज़िन्दगी में,
उतने आबाद नहीं है हम
जैसा सोच रहे हो तुम,
उतने आज़ाद नहीं है हम
पिंजरे में रह कर मिलता तो सब है,
बस इस पिंजरे पर ही मेरा हक़ है
इस पिंजरे में रह कर देखती रहती हूँ दिन और रात,
कब आज़ाद हो जाउंगी बस सोचती रहती हूँ यही एक बात
जैसा सोच रहे हो तुम,
उतने आज़ाद नहीं है हम
पिंजरे से बाहर निकलने की कोशिश में,
सब रिश्ते नाते टूट गए
जितना सबको साथ रखा,
मन से उतना ही टूट गए
जैसा सोच रहे हो तुम,
उतने आज़ाद नहीं है हम
छोटी सोच के इस दरवाज़े पर इंसान अँधेरा ही पता है,
और ज़िन्दगी की इस भीड़ में अकेला ही रह जाता है
सोच ही इंसान की इंसानियत को बताती है,
सोच ही इंसान को आगे लेकर जाती है
जैसा सोच रहे हो तुम,
उतने आबाद नहीं है हम
जैसा सोच रहे हो तुम,
उतने आज़ाद नहीं है हम
उतने आज़ाद नहीं है हम !!!!!!!

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