खामोशी.....
खुद के अंदर ही ये खामोशी रहती है,
अंदर ही अंदर सब कुछ सहती है
कायर सी लगती है ये खामोशी कभी,
लगता है बोल दे सब कुछ अभी
ये खामोशियाँ बड़ी चुभ सी जाती है,
इनकी आहट भी कहाँ आती है
मेरी ही खामोशी मुझे मार देती है,
यही मुझे सबसे बड़ी हार देती है
क्यों गलत देख कर भी चुप रह जाते है,
क्यों किसी से कुछ कह नहीं पाते है
ये खामोशी अंदर ही अंदर तोड़ देती है,
ये ज़िन्दगी को किसी और ही दिशा में मोड़ देती है
घुटन सी होने लगती है इस खामोशी में रह कर,
कैसे चुप रह जाते है लोग सब कुछ सह कर
खामोश रहने वाले अंदर से टूट जाते है,
वो खुद ही अपनी ज़िन्दगी से रूठ जाते है
खुद के अंदर ही ये खामोशी रहती है,
अंदर ही अंदर सब कुछ सहती है !!!!!

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